Friday, October 23, 2009

बांस के बहंगिया और रुनकी-झुनकी बेटी


पटना। पौ फटने के बाद भी चूल्हे का सुनगुन आज स्थिर है। शायद इसे भी माताओं के गंगा स्नान और कठौत में गंगाजल भरे जाने का इंतजार है। चहुंओर से व्रती तेज कदम जिस गंगा की ओर जा रहे हैं, आज उसकी लहरें भी छठ गीतों के अनुगूंज के साथ बलखायेंगी। वे लोकगीत जिसके समवेत गायन मात्र से अलौकिक ऊर्जा का संचार हमारे मन को विभोर कर देता है। गंगा घाट की सीढि़यों से मानो लोकगीतों के बोल की ध्वनि-प्रतिध्वनि टकरा रही है। भक्तिरस में सराबोर राजधानी का हर कोना छठ गीतों से गुंजायमान है।




सुबह के चार बजे है और यह संवाददाता कलेक्ट्रेट घाट की सीढि़यों पर खड़ा इतिहास से भी पुरानी परम्पराओं में छठ गीतों को समाते देख रहा है। याद आ रहे है देवेन्द्र सत्यार्थी। कृष्ण की बांसुरी में भी मिठास न होती अगर इसमें लोक के तत्व और आख्यान न होते। आसमान अपने रंग में खुल रहा है। सूर्य तट पर झुका हुआ है। आसक्त सा। छठ का महापर्व इसी रागात्मकता का आख्यान भी तो है। चिड़ियों ने भी अपनी धुन गानी शुरू कर दी है। शायद परों में भी बहंगी की लचक थरथरा रही थी। गंगा की लहरों में कंपन था दीप की लौ जैसा जो शायद सूर्य को समर्पित रहा हो।



मैं सुन रहा हूं छठ गीत, जिसे सुनते ही मन में रागात्मक श्रद्धा का स्पंदन होने लगता है। रोम-रोम कांच बांस की बहंगी की तरह डोलता है और मन की पवित्रता धरा पर भी झिलमिलाने लगती है। कामना का मंगल उत्सव है यह महापर्व। तभी तो लोक गीतों में 'जनम-जनम अहिवात' और 'छताछत सोभाग' की बात कही जाती है। लोक संस्कृति के इस उत्सव में गाये जानेवाले गीत खेती- किसानी और जीवन संघर्ष से गहरे तक जुड़े हैं। पर्व के साथ हमारी कृषि संस्कृति का जुड़ाव और उसके बिम्ब लोकगीत में देखने हों तो छठ मां के गीत गुनगुनाइए, जिसमें बांस की बहंगी तो है ही केरवा का घवध भी है..



'कांच ही बांस के बहंगिया, बहंगी लचकत जाए .. केरवा जे फरेला घवध से, ओह प सुग्गा मेड़राय' मनुष्य मन की श्रद्धा और पवित्रता का कोई जोर ही नहीं है। सुग्गा (तोता) को भी केला के घौद पर बैठने की इजाजत नहीं है। पवित्रता और कृषि जीवन का समागम देखना हो तो छठ व्रत में व्यवहृत चीजों की बारीकी पहचानिए। बांस का सूप, बांस की टोकरी, हल्दी के पौधे, चावल-गेहूं तो कद्दू-अदरख, नारियल-नींबू, ईख और ना जाने क्या-क्या। सूर्य चूंकि जाग्रत देवता है। पर्यावरण और ऋतुचक्र के स्वामी हैं, इसलिए हम अस्ताचलगामी सूर्य को अ‌र्घ्य देकर फिर दूसरे दिन के उगते सूरज का इंतजार करते हैं। सूर्य के इस तेजस्वी स्वरूप की कामना भी लोकगीतों में है। स्वर्ण वर्ण, माथे पर लाल तिलक और पांव में सोने का खड़ाऊ।



'सोने के खड़ाऊां हो दीनानाथ..



तिलक लिलार, हाथे सचकुनियां हो दीनानाथ अरग लेल ठार..



कामनाएं भी करती हैं, हमारी माताएं-



'पहला सुख निरोगी काया,



दूजा सुख थोड़ी सी माया,



तिजा सुख पतिव्रता नारी,



चौथा सुख पुत्र आज्ञाकारी



पांचवा सुख जो सबै सुहाय,



छठा सुख संतन को भाए।



यह सब तो कामना ही है। लेकिन इसमें संपूर्ण परिवार और समाज के मंगल का जो उत्स छुपा है, वह और कहां दिखता।



लोकगीतों पर अध्ययन कर रहीं, आकाशवाणी की कार्यक्रम अधिशासी डा. मीरा झा कहती हैं कि आज भले ही लोग कन्या बचाओ की पुकार मचा रहे हों लेकिन छठ गीत में तो सनातन समय से बेटियों के प्रति गहरी आस्था है। उनके होने की मंगल कामना है। गीत की पंक्ति सुनें-'रूनकी-झुनकी बेटी मंगलहुॅं.



पढ़ल-पंडित जमाई।'



पुरातन संस्कृति में सूर्य को शक्तिरूपा माना गया है। वैदिक युग के आख्यान के अनुसार, जिन दैवीय शक्तियों ने सूर्य देवता की रचना की, वह गायत्री कहलायीं तथा विभिन्न देवी-देवता उसी के रूप है। सूर्य की शक्ति ही 'छठी मइया' हैं। वैदिक परम्परा में भी अनेक मंत्र ऐसे है जो सूर्य को समर्पित है। विष्णु पुराण का एक आख्यान है कि सूर्य ने विश्वकर्मा की पुत्री तथा बाद में छाया से विवाह किया। पहली पत्नी से उन्हे जो पुत्र प्राप्त हुआ वह यम था। इसलिए सूर्य की उपासना वाला यह पर्व दीर्घ जीवन की कामना करता है। हमारे लोक गीतों में यह गाया भी जाता है- अपना लऽ मंगलहॅुं अवध सिंदूरवा



जनम-जनम अहिवात.. हे छठि मइया.। (अवध सिंदूर का अभिप्राय यहां भगवान राम से है। कामना यह कि अवध के राम जैसा वर मिलें।)


जीव ईश्वर का अंश तो है ही, वही माया है और वही कलिकाल से ग्रस्त भी है। माया ने ही ब्रह्मा और जगत में भेद उत्पन्न करके भक्त को उद्भ्रांत कर रखा है। इस पर्व के गीतों में भी इसकी छाया है, जब माताएं नदी-ताल-तलैया के घाट पर गाती हैं-'दूजा सुख थोड़ी सी माया..। '

साभार : दैनिक जागरण , पटना

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