साभार : दैनिक जागरण , पटना !
भुवनेश्वर वात्स्यायन, पटना : ब्रिटेन के वेस्ट नाटिंघमशायर कालेज की प्राचार्या श्रीमती आशा खेमका ने कहा है कि वे बिहार की बेटी होने के नाते अपनी मिट्टी के लिए कुछ करना चाहती हैं। उन्हें हाल ही में आफिसर आफ द आर्डर आफ द ब्रिटिश एंपायर के लिए चुना गया है। उच्च शिक्षा में उल्लेखनीय योगदान के लिए यह सम्मान उन्हें इंग्लैंड की महारानी एलिजाबेथ खुद प्रदान करेंगी। श्रीमती खेमका ने जागरण को भेजे ई-मेल में कहा है कि वह गृह राज्य में बच्चों की शिक्षा के बहुआयामी विकास और उन्नयन के लिए बिहार सरकार के सहयोग से कुछ प्रभावीअभियान चलाना चाहती हैं। पहले भी वह राजस्थान में इस तरह की सामाजिक पहल कर चुकी हैं। राजस्थान सरकार ने उन्हें इसके लिए आमंत्रित किया था। गौरतलब है कि श्रीमती खेमका को दिये जा रहे इस महत्वपूर्ण अन्तरराष्ट्रीय सम्मान और उनकी सफलता यात्रा के बारे में खबर दैनिक जागरण में 29 जनवरी को छपी थी। इसके बाद देश-विदेश में फैले अपने जानने वालों की बीच हुई सुखद प्रतिक्रिया पर उन्होंने ई-मेल पर आभार जताया और कहा कि जागरण में छपे एक-एक शब्द उनकी अपनी चमकती खुशी हो गये हैं। उन्होंने इस संवाददाता से डुमरा (सीतामढ़ी) से नाटिंघमशायर तक की अपनी गौरव यात्रा और सपनों के बारे में मेल के जरिये बातचीत की। उनके शब्दों से लगा कि अपनी जमीन से लगाव को याद कर वे भावुक हो गई हैं। उन्होंने लिखा है- जैसा कि मैं खुद देख- पढ़ और सुन रही हूं, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बहुत कम समय में बिहार की सूरत बदलने में कामयाबी पा ली है। राज्य ने उल्लेखनीय प्रगति की है। बिहार में शिक्षा से वंचित बच्चों की बड़ी तादाद के बारे में उन्होंने कहा कि ब्रिटेन की तस्वीर भी इससे बहुत अलग नहीं है। बच्चों को लेकर बड़ों की दुनिया शायद हर जगह उतनी संवेदनशील नहीं है, जितनी सभ्य समाज से अपेक्षाएं थीं। मेल में उन्होंने लिखा है- आपको यह जानकर हैरत होगी कि इंग्लैंड में 16 से 19 साल तक की उम्र के बच्चे किसी भी तरह की शिक्षा से वंचित है। उनके पास न कोई काम है और न उन्हें प्रशिक्षित किये जाने की कोई योजना। इंग्लैंड में यह बड़ा सामाजिक और बहस का गरम मुद्दा है। यद्यपि इस अभिशाप से निबटने के लिए समय- समय पर कई प्रयास एवं प्रयोग किये गये हैं, मुझे यह लिखते हुए खुशी हो रही है कि मेरे कालेज (वेस्ट नाटिंघमशायर)- जिसकी मैं प्रिंसिपल हूं, इस तरह के प्रयासों में अग्रिम मोर्चे पर रहा है। इसके कार्य यहां देश के स्तर पर उल्लेखनीय रहे। उन्होंने लिखा है कि जिस किसी ने इंग्लैंड में जागरण की वह इलेक्ट्रानिक प्रति पढ़ी- जिसमें उनके बारे में लिखा गया था, भावुक हो गया। उनके लिए भी ये बहुत रोमांचक और स्पन्दित क्षण थे, जब जागरण उनके सामने था। जो कुछ लिखा गया था, वह उन अक्षरों की स्नेहिल ऊष्मा में बही जा रही थीं।


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